कबीर दास के दोहे जानिए सही अर्थ के साथ। Kabir Das Ke Dohe Hindi - Smart Way

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Wednesday, March 18, 2020

कबीर दास के दोहे जानिए सही अर्थ के साथ। Kabir Das Ke Dohe Hindi


नमस्कार दोस्तों आज हमें आपके लिए संत कबीर दास जी के दोहे(Kabir Das Ke Dohe In Hindi) लेकर आये है। यहाँ हम आपको कबीर दास द्वारा बताये गए दोहे बताएँगे और वो भी उनके(Kabir Ke Dohe Meaning In Hindi) अर्थ के साथ और उस अर्थ का पूरा स्पस्टीकरण भी।





ये आपके जीवन के लिए के दिशा की तरह काम करेगा। इसके माद्यम से आप अपने जीवन में उस समस्याओ का सामना करना सीख जायेंगे जो की आपके सामने अभी बहुत बड़ी है। इसलिए इस पोस्ट को पूरा जरूर पढ़े और कमेंट में अपनी राय भी जरूर दे।

कबीर दास के दोहे सही अर्थ सहित | Kabir Ke Dohe Meaning In Hindi | Kabir Das Ke Dohe Hindi | 


"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।"


अर्थ-महा कवी कबीर दास जी हमें इस में बताना चाहते है की जब वो इस दुनिया में बुराई खोजने गया तो मुझे इस पूरी दुनिया में कोई भी बुरा नहीं मिला। लेकिन जब उन्होंने अपने अंदर ही झाक कर देखा तो उन्होंने पाया की इस दुनिया में तो मुझसे बुरा कोई है ही नहीं।

स्पष्टीकरण-हम सब अपने जीवन में हमेशा दुसरो की बुराईया देखते है लेकिन खुद की बुराईयो को हम नजरअंदाज कर जाते है। जब की हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। क्योकि जब हम खुद अपनी बुराइयों को देखना शुरू कर देंगे और दुसरो की बुराइयों को देखना बंद कर देंगे तो हमें पता चलेगा की वो तो कभी बुरे थे ही नहीं नहीं बल्कि हम ही बुरे थे जो दुसरो की बुराइयों को देखते है।

"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"

अर्थ-इसका सही अर्थ है की इस संसार में जितने भी लोग थे वो बड़ी बड़ी किताबो को पढ़ कर मृत्यु को प्राप्त हो गए , लेकिन सब के सब विद्वान नहीं बन पाए। कबीर दास जी का ऐसा मानना है की यदि कोई मनुष्य अपने जीवन में प्रेम मतलब प्यार के केवल ढाई अक्षर भी अच्छी तरीके से पढ ले तो वो भी एक सच्चा ज्ञानी बन जाता है।

स्पष्टीकरण-आप बहुत सी बार ऐसे लोगो से मिले होंगे जो बहुत पढ़े लिखे होते है और  बहुत ही कामियाब भी होते है। लेकिन उन लोगो को अपनी शिक्षा का और अपनी कामयाबी का बहुत घमंड होता है। वो दुनिया को ये दिखाते है की उसके जितना ज्ञानी इस दुनिया में कोई नहीं है।

यही कारण था की कबीर दास का ऐसा मानना था की प्यार के ढाई अक्षर सीख लेने वाला मनुष्य ही ज्ञानी होता है जब की बहुत सारी किताब पढ़ने वाले कभी इतने विद्वान नहीं बन पाते है। वो सफल इंसान तो बन जाते है। लेकिन एक अच्छे व्यक्तित्व के मालिक नहीं बन पाते।

"तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,

कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।"

अर्थ-कबीर दास यहाँ ये कहना चाहते है उस छोटे से तिनके की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए जो आपके पेरो के निचे दब जाता है। क्योकि यदि यही तिनका उड़कर हमारी आँख में गिर जाता है तो वो और भी ज्यादा पीड़ा पहुँचता है।

स्पष्टीकरण-जब भी हमारे जीवन में छोटी छोटी घटनाये घटती है तो हम उसको बहुत बड़ी घटना मान कर कभी अपने जीवन से बाहर नहीं निकल पाते और उसके लिए हमेशा दुसरो को जिम्मेदार मानने लगते है। जबकि हम ये भूल जाते है की ये तो छोटी सी समस्या है यदि ये बड़ी होती तो हमें और भी परेशान कर सकती थी।

इसलिए जीवन में हमेशा परेशनियो से ज्यादा हमें उनके हल पर ध्यान देना चाहिए। ताकि हमारा जीवन सफल हो सके।

"धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।"

अर्थ-कबीर दास जी ने इस दोहे के माध्यम से बहुत अच्छी बात हमें बताई है इसका अर्थ है की अपने मन में धर्य रखने से सब होता है यदि माली किसी पेड़ और पौधे तो एक बार में ही सौ घड़ो के पानी से भी सींचने लग जाता है तो वो पेड़ फिर भी फल तो तब ही देगा जब उस फल की ऋतू आएगी।

स्पष्टीकरण-ये हमारे जीवन की सफलता के बीच की सबसे बड़ी रुकावट होती है। जब भी हम कोई काम करने लगते है तो हम ये चाहते है की इसका परिणाम हमें एक या दो दिन में ही मिल जाये और जब हमें एक दो दिन में परिणाम नहीं मिलता तो हम उस काम को करना बंद कर देते है। हम सभी में धर्य की बहुत कमी होती है जोकि हमें सफल नहीं होने देता है। यदि आप किसी सफल आदमी से मिले हो तो आपको पता चलेगा की वो भी एक दम से सफल नहीं हुआ है उसको भी बहुत समस्याओ का सामना करना पड़ा है उसके बाद वो सफल हुआ है यदि आप ये सोचते हो की आपको एक दम से सफलता मिल जाएगी तो ये सबसे बड़ी भूल है।

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।"

अर्थ-यहाँ कबीर दास जी कहना चाहते है की जब भी आप किसी से मिले तो कभी उसकी जाति नहीं पूछ कर हमेशा उसके ज्ञान के बारे में पूछना चाहिए। क्योकि हमेशा तलवार का मूल्य ज्यादा होता है जबकि उसकी म्यान मूल्य कुछ नहीं होता जबकि तलवार को म्यान में ही रखा जाता है।

स्पष्टीकरण-हम सब की ये एक बहुत बुरी आदत है की हम हमेशा दुसरो को उनके दिखावे से और पहनावे अच्छा मानने लगते है। जब की कबीर हमें सिखाते है की हमे कभी दुसरो को उनके धन, तन, जाति से नहीं पूछना चाहिए बल्कि उसके ज्ञान और उसकी मन की स्वछता को ध्यान में रखना चाहिए।

"दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,

अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।"

अर्थ-कबीर दास जी कहते है की मनुष्य हमेशा दुसरो के दोषो को देख कर हसता है और अपने दोषो को याद भी नहीं करता जिसका न ही कोई आदि है और न अंत।

स्पष्टीकरण-हमे इसका कोई अधिकार नहीं है की हम दुसरो में दोष खोजते रहे। क्योकि यदि हम दोषो को खोजने निकले तो हमें ये पता चलेगा की जिनते दोष दुसरो में है उससे कई ज्यादा दोष तो हम अपने अंदर लेकर बैठे है। इसलिए हमें दुसरो के जीवन में क्या हो रहा है इसपर ध्यान नहीं देकर अपने खुद के जीवन को हम कैसे बेहतर बना सकते है इसपर ध्यान देना चाहिए।

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